बड़ी
बेचैनी से रात कटी। बमुश्किल सुबह एक रोटी खाकर घर से अपने शोरूम के लिए निकला। आज
किसी के पेट पर पहली बार लात मारने जा रहा हूँ। ये बात अंदर ही अंदर कचोट रही है। जिंदगी
में यही फलसफा रहा मेरा कि, अपने आस पास किसी को रोटी के लिए तरसना ना पड़े। पर इस विकट काल
में अपने पेट पर ही आन पड़ी है। दो साल पहले ही अपनी सारी जमा पूंजी लगाकर कपड़े का
शोरूम खोला था, मगर दुकान के सामान की बिक्री, अब आधी हो गई है। अपने कपड़े के शोरूम में दो लड़के और दो लड़कियों को रखा
है मैंने, ग्राहकों को कपड़े दिखाने के लिए। लेडीज
डिपार्टमेंट की दोनों लड़कियों को निकाल नहीं सकता। एक तो कपड़ों बिक्री इन्हीं की
ज्यादा है। दूसरे वे दोनों बहुत गरीब हैं। दो लड़कों में से एक पुराना है, और वह घर में इकलौता कमाने वाला है। जो नया वाला लड़का है दीपक, मैंने विचार उसी पर किया है। शायद उसका एक भाई भी है, जो अच्छी जगह नौकरी करता है। और वह खुद, तेजतर्रार
और हँसमुख भी है। उसे कहीं और भी काम मिल सकता है। इन पांच महीनों में मैं बिलकुल
टूट चुका हूँ। स्थिति को देखते हुए एक वर्कर कम करना मेरी मजबूरी है। यही सब सोचता
दुकान पहुंचा। चारों आ चुके थे। मैंने चारों को बुलाया और बड़े उदास हो बोल पड़ा।
देखी
दुकान की अभी की स्थिति तुम सब को पता है, मैं तुम
सब को काम पर नहीं रख सकता। उन चारों के माथे पर चिन्ता की लकीरें मेरी बातों के
साथ गहरी होती चली गई। मैंने बोतल के पानी से अपने गले को तर किया किसी एक का
हिसाब आज कर देता है। दीपक तुम्हें कहीं और काम ढूंढना होगा। जी अंकल उसे पहली बार
इतना उदास देखा। बाकियों के चेहरे पर कोई खास प्रसन्नता नहीं थी। एक लड़की जो शायद
उसी के मोहल्ले से आती हैं, कुछ कहते-कहते रुक गई। क्या बात
है बेटी? तुम कुछ कह रही थी? अंकल जी,
इसके भाई का भी काम कुछ एक महीने पहले छूट गया है। इसकी
मम्मी
बीमार रहती है। नज़र दीपक के चेहरे पर गई। आँखों में जिम्मेदारी के आँसू थे। जो वह
अपने हँसमुख चेहरे से छुपा रहा था। मैं कुछ बोलता कि तभी एक और दूसरी लड़की बोल
पड़ी अंकल, बुरा ना माने तो एक बात बोलूं ? हाँ हाँ
बोल ना। किसी को निकालने से अच्छा है, हमारे पैसे कम कर दो
आप। मैंने बाकियों को तरफ देखा। हाँ साहब!
हम इतने से काम चला लेंगे। बच्चों ने मेरी परेशानी को आपस में बांटने का सोच मेरे
मन के बोझ को कम जरूर कर दिया था।
‘पर तुम लोगों को ये कम तो नहीं पड़ेगा न?’
‘नहीं साहब! कोई साथी भूखा रहे ... इससे अच्छा है, हम
सब अपना निवाला थोड़ा कम कर दें।’
मेरी
आँख में आंसू छोड़ ये बच्चे अपने काम पर लग गए, मेरी नजर
में मुझसे कहीं ज्यादा बड़े बनकर
"मैं"
का मिटना ईश्वर अनुकम्पा
सुकरात
समुद्र तट पर टहल रहे थे। उनकी नजर तट पर खड़े एक रोते बच्चे पर पड़ी, उसके पास गए और प्यार से बच्चे के सिर पर हाथ फेरकर पूछा तुम क्यों रो रहे
हो ? लड़के ने कहा ये जो मेरे हाथ में प्याला है में उसमें
इस समुद्र को भरना चाहता हूँ पर यह मेरे प्याले में समाता ही नहीं।
बच्चे
की बात सुनकर सुकरात विस्माद में चले गये और स्वयं रोने लगे, अब पूछने की बारी बच्चे की थी। कहने लगा आप भी मेरी तरह रोने लगे पर आपका
प्याला कहाँ है ?
सुकरात
ने जवाब दिया बालक, तुम छोटे से प्याले में समुद्र भरना चाहते हो, मैं अपनी छोटी सी बुद्धि में सारे संसार की जानकारी भरना चाहता हूँ। आज
तुमने सिखा दिया कि समुद्र प्याले में नहीं समा सकता मैं व्यर्थ ही बेचैन रहा। यह
सुन के बच्चे ने प्याले को दूर समुद्र में फेंक दिया और बोला सागर अगर तू मेरे
प्याले में नहीं समा सकता तो मेरा प्याला
तो तुम्हारे में समा सकता है।
इतना
सुनना था कि सुकरात बच्चे के पैरों में गिर पड़े और बोल बहुत कीमती सूत्र हाथ में
लगा है। हे परमात्मा आप तो सारा का सारा
मुझ में नहीं समा सकते पर मैं तो सारा का सारा आपमें लीन हो सकता हूँ।
ईश्वर
की खोज में भटकते सुकरात को ज्ञान देना था तो भगवान उस बालक में समा गए। सुकरात का
सारा अभिमान ध्वस्त कराया, जिस सुकरात से मिलने के लिए सम्राट समय लेते थे वह सुकरात एक
बच्चे के चरणों में लेट गए। ईश्वर जब आपको अपनी अनुकम्पा में लेते हैं तब आपके
अंदर का मैं सबसे पहले मिटता है। शायद मैंने उल्टी बात कह दी। जब आपके अंदर का मैं
मिटता है तभी ईश्वर की अनुकम्पा होती है।
